कोटा महाभारत: महापौर अनुसूइया की गांडीव और विवेक की सुदर्शन नीति


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शिक्षा नगरी में महापौर करेगी नेतृत्व, उपमहापौर करेगा जमीनी सोशल इंजीनियरिंग
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✍️ डॉ नयन प्रकाश गांधी, देश के प्रतिष्ठित पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट

कोटा के एक पुराने कार्यकर्ता ने जीत के बाद कहा, इस बार हमने पार्षद नहीं चुने, हमने घर के दो जिम्मेदार सदस्य चुने हैं। एक भाभी जो घर जोड़ती है, एक भाई जो घर चलाता है। यही इस पूरी कवर स्टोरी का मानव कोण है। राजनीति के शोर में अक्सर रिश्तों की मिठास खो जाती है, लेकिन इस बार भाजपा ने रिश्ते को ही राजनीति की ताकत बना दिया है।शहर के चाय के ठेलों से लेकर कोचिंग की गलियों तक एक ही चर्चा है। महापौर अनुसूया गोस्वामी और उपमहापौर विवेक राजवंशी। लोग इन्हें पद से नहीं, भाव से देख रहे हैं। कोई कह रहा है भाभी आ गई हैं, अब सुनवाई होगी। कोई कह रहा है भाई साथ हैं, अब काम होगा। और इस विश्वास के पीछे सबसे बड़ा नाम है लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का।यह किसी से छिपा नहीं है कि पर्दे के पीछे से इन दोनों विजेता प्रत्याशियों के चयन पर शुरू से ही बिरला जी का आशीर्वाद और मार्गदर्शन रहा है। उन्होंने दिल्ली की व्यस्तता के बावजूद कोटा के एक एक वार्ड की नब्ज पर हाथ रखा। किस बस्ती में कौन सा चेहरा स्वीकार होगा, किस कार्यकर्ता में कितनी क्षमता है, इसका आकलन उन्होंने स्वयं किया। यही कारण है कि प्रत्याशी चयन में न नाराजगी हुई, न बगावत। यह उनकी चाणक्य जैसी संगठन क्षमता का प्रमाण है।

इस जीत की दूसरी धुरी हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। उनके जन हितैषी कार्यों, स्वच्छ भारत, उज्ज्वला, आयुष्मान और नारी शक्ति वंदन ने आम मतदाता के मन में भाजपा के प्रति गहरा विश्वास पैदा किया। तीसरी धुरी है भजनलाल सरकार का डबल इंजन। जब केंद्र की योजना और राज्य की इच्छाशक्ति एक साथ जुड़ती हैं, तो नगर निगम जैसी इकाई को काम करने के लिए धन और दिशा दोनों मिलते हैं।

अब आते हैं दो पात्रों पर, जिनके इर्द गिर्द यह महाभारत बुनी गई है।

अनुसूया गोस्वामी को जो जानते हैं, वे उनकी सादगी के कायल हैं। वे मंच पर बड़ी बातें नहीं करतीं, वे बस्ती में जाकर छोटी छोटी समस्याएं सुनती हैं। पार्टी के प्रति उनका समर्पण किसी से छिपा नहीं। उन्होंने संगठन के लिए अपने सुख का त्याग किया है। महिला मोर्चा की एक साधारण कार्यकर्ता से महापौर तक का उनका सफर संघर्ष की पाठशाला है। समाजसेवा का उनका अनुभव किताबी नहीं, जमीनी है। किसी बेटी की शादी हो या किसी बीमार का इलाज, लोग आज भी सबसे पहले भाभी को याद करते हैं। यही उनकी गांडीव है, जनता का प्रेम। यह गांडीव बाण नहीं चलाता, यह दिल जीतता है।

विवेक राजवंशी की कहानी अनुशासन की कहानी है। वे भाजपा के कट्टर सिपाही हैं, लेकिन उनका कट्टरपन विचारधारा के प्रति है, व्यक्ति के प्रति नहीं। इसीलिए वे युवाओं में लोकप्रिय हैं, महिला शक्ति उनका सम्मान करती है और वरिष्ठ नेता उन पर भरोसा करते हैं। पक्ष हो या विपक्ष, वे सबके लिए सुलभ हैं। हर उत्तरदायित्व को निभाने की कला उन्हें सबसे अलग करती है। उन्हें संगठन ने जो काम दिया, उन्होंने उसे मिशन की तरह पूरा किया। उनकी यही कार्यशैली सुदर्शन नीति है, जो लक्ष्य को भेदती है, लेकिन मर्यादा नहीं तोड़ती।
रामायण में कौशल्या श्रीराम की मां थीं और लक्ष्मण की विमाता होते हुए भी ममतामयी मां थीं। लक्ष्मण उन्हें सगी मां सुमित्रा के समान आदर देते थे। ठीक उसी प्रकार राजनीति में अनुसूया सबकी भाभी मां हैं और विवेक सेवा भावी भाई। एक मर्यादा देती हैं, दूसरा सेवा करता है। महाभारत में अर्जुन के रथ को कृष्ण ने संभाला था। यहां विकास के रथ को बिरला रूपी कृष्ण का आशीर्वाद मिला है, अर्जुन रूपी भाभी के हाथ में गांडीव है और सारथी रूपी भाई के पास विवेक है। हर प्रतीक आपस में जुड़ा है, कोई भी उपमा थोपी हुई नहीं लगती।

समस्याएं भी मानवीय हैं। सुबह जब मां अपने बच्चे को कोचिंग भेजती है तो उसे डर लगता है कि सड़क पर आवारा पशु न मिल जाएं। जब पिता नल खोलता है तो पानी नहीं आता। जब दुकानदार दुकान खोलता है तो अतिक्रमण से ग्राहक नहीं आ पाता। इन छोटी छोटी तकलीफों का हल बड़े भाषणों में नहीं, रोज के प्रबंधन में है।

इसीलिए अपेक्षा है कि भाभी की ममता सफाई व्यवस्था को सुधारेगी। जीपीएस से जुड़ी कचरा गाड़ियां समय पर आएंगी। भाई का विवेक जल निगम के अधिकारियों से पुरानी लाइनें बदलवाएगा। दोनों मिलकर कोचिंग क्षेत्रों में पार्किंग और फुटपाथ की समस्या सुलझाएंगे। छात्रों के लिए हॉस्टल पंजीकरण और सहायता केंद्र बनाएंगे।

स्मार्ट सिटी का सपना तभी पूरा होगा जब वह संवेदनशील सिटी बनेगा। तकनीक जरूरी है, लेकिन स्पर्श भी जरूरी है। एक ऐप से शिकायत दर्ज हो, यह स्मार्टनेस है। लेकिन शिकायत पर खुद महापौर का फोन आ जाए, जैसे राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल सरकार को आए दिनों फोन उठाते देखते हैं, यह संवेदनशीलता अब डबल नहीं ट्रिपल इंजन में रहेगी। कोटा को अब इसी की जरूरत है।

अंत में एक बुजुर्ग मतदाता की बात याद आती है। उन्होंने कहा था, हमने पहले भी महापौर देखे हैं, लेकिन इस बार ऐसा लग रहा है जैसे घर के ही दो लोग नगर निगम गए हैं। यही इस जीत की सबसे बड़ी पूंजी है। यदि भाभी का धैर्य और भाई का कर्म अगले पांच साल तक बना रहा, तो चंबल तट पर विकास का जो महाभारत शुरू हुआ है, उसमें जीत धर्म की ही होगी।

रिपोर्टर

  • Dr. Rajesh Kumar
    Dr. Rajesh Kumar

    The Reporter specializes in covering a news beat, produces daily news for Aaple Rajya News

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